Friday, 17 September 2021

केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त मूल-अधिकार

  

मूल अधिकार की परिभाषा :-

  • मूल अधिकारों को उन अधिकारों के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास लिए आवश्यक हो। 
  • यह अधिकार व्यक्ति के बौद्धिक, नैतिक, और आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।



भारतीय नागरिकों को प्राप्त मूल-अधिकार

अनुच्छेद- 15

धर्ममूलवंशजातिलिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध

अनुच्छेद- 16

लोक-नियोजन के विषय अवसर की समानता

अनुच्छेद- 19

वाक्-स्वातंत्र्यसंघ बनानेसंचरणनिवास और वृत्ति की स्वतंत्रताएं

अनुच्छेद- 29

अल्पसंख्यक वर्ग के हितों का संरक्षण

अनुच्छेद- 30

शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यकों का अधिकार

 

कौन-कौन से मौलिक अधिकार होते हैं। 

निति निर्देशक तत्व, उद्देश्य महत्व!!!




 

मौलिक-कर्त्तव्य

 

-: मौलिक-कर्त्तव्य :- 

Maulik-Kartavya
Maulik-Kartavya


  • संविधान में उल्लेख :- भाग 4-क तथा अनुच्छेद 51-क में। 

  • मूल-संविधान में नागरिकों के मूल कर्तव्यों का कोई उल्लेख नहीं था। 

  • 1976 में संविधान के पुनरीक्षण के लिए गठित स्वर्ण सिंह समिति की रिपोर्ट के आधार पर इसे संविधान में जोड़ा गया। 

  • 42वां संविधान संशोधन द्वारा संविधान के भाग 4-क तथा अनुच्छेद 51-क को जोड़कर 10 मूल कर्तव्य को सम्मिलित किया गया। 

  • 86 वां संविधान संशोधन अधिनियम-2002 द्वारा संविधान के भाग-4 के अनुच्छेद-51 में संशोधन करते हुए 6 से 14 वर्ष के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा का अधिकार प्रदान करने संबंधी अभिभावकों का कर्तव्य निर्धारित किए गया है। 

  • इस प्रकार वर्तमान में भारतीय संविधान में 11 प्रकार के मूल कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है। 

  • नागरिकों के मूल-कर्तव्य पूर्व सोवियत संघ के संविधान से ग्रहण किये गया है। 



नागरिकों के 11 मूल-कर्तव्य इस प्रकार हैं :-



1) संविधान का पालन करें और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करें। 

2) स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखें
और उनका पालन करें। 

3) भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करें और उसे अक्षुण्ण बनाए रखें। 

4) देश की रक्षा करें और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करें। 

5) भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भातृत्व की भावना का निर्माण करें, जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हो। 

6) हमारी सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परिरक्षण करें। 

7) प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील ,नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करें और उसका संवर्धन करें तथा प्राणीमात्र के प्रति दयाभाव रखे। 

8) वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें। 

9) सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखें और हिंसा से दूर रहें। 

10) व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करें जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊंचाइयों को छू ले। 

11) जो माता-पिता या संरक्षक है, 6 वर्ष से 14 वर्ष के मध्य आयु के अपने बच्चों या, यथास्थिति अपने पाल्य को शिक्षा का अवसर प्रदान करें। (यह कर्तव्य 86वां संविधान संशोधन अधिनियम 2002 द्वारा जोड़ा गया है)



भारत और उसका राज्य क्षेत्र

 

 भाग -1
"भारत और उसका राज्य क्षेत्र"


भारत के क्षेत्र के बारे में संविधान के भाग 1 तथा अनुच्छेद 1-4, तक में प्रावधान किया गया है 

राज्यों तथा संघ राज्य क्षेत्रों के संबंध में निम्नलिखित संवैधानिक प्रावधान किया गया है:- 


अनुच्छेद 1:- भारत और उसका राज्य क्षेत्र। 

इस विषय में निम्नलिखित प्रावधान है :-

  • भारत अर्थात इंडिया राज्यों का संघ होगा 
  • राज्यों के राज्य क्षेत्र 
  • पहली अनुसूची में वर्णित राज्य क्षेत्र 
  • ऐसे अन्य राज्य क्षेत्र जो अर्जित किए जाएं शामिल होंगे 


पहली अनुसूची में 28 राज्यों तथा 8 संघ राज्य क्षेत्रों का उल्लेख है


अनुच्छेद 2:- नए राज्यों का प्रवेश या स्थापना। 

संसद को यह अधिकार दिया गया है कि वह विधि बनाकर संघ (भारत) में नए राज्यों को प्रवेश दे सकता है, या नए राज्यों की स्थापना कर सकता है। 

संसद द्वारा विधि बनाकर सिक्किम राज्य (1975 में) को भारत संघ में प्रवेश कर चुका है। 

(संसद द्वारा तक 15 बार इस शक्ति का उपयोग कर चुका है।) 



अनुच्छेद 3:- नए राज्यों का निर्माण, वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन। 

इस अनुच्छेद द्वारा संसद नए कानून बनाकर निम्नलिखित कार्य करने का अधिकार है:- 

  • किसी राज्य में से उसका राज्य क्षेत्र अलग करके या दो अथवा अधिक राज्यों को या राज्यों के भागों को मिलाकर या किसी अन्य राज्य क्षेत्र को किसी राज्य के साथ मिलाकर नए राज्य किया निर्माण का 
  • किसी राज्य के क्षेत्र में वृद्धि करने का. 
  • किसी राज्य की सीमाओं में परिवर्तन करने का, 
  • किसी राज्य के नाम में परिवर्तन करने का। 


संसद उक्त चारों को कानून बनाकर ही उपरोक्त कार्य को कर सकते हैं। इसके लिए संसद में विधेयक पेश करना होता है, ऐसे विधेयकों को संसद में पेश करने के लिए उस पर राष्ट्रपति की सहमति देना आवश्यक है। 


भारत के 28 राज्य और उनका निर्माण वर्ष

भारत के 28 राज्य और उनकी राजधानियाँ




राष्ट्रपति का निर्वाचन की रीति या पद्धति

  

-: राष्ट्रपति का निर्वाचन की रीति या पद्धति :-


राष्ट्रपति का निर्वाचन ऐसे निर्वाचन मंडल द्वारा किया जाएगा जिसमें संसद (लोकसभा तथा राज्यसभा) तथा राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य शामिल होंगे। 

राष्ट्रपति के निर्वाचन मंडल में संसद के मनोनीत सदस्य। राज्य विधानसभाओं के मनोनीत सदस्य तथा राज्य विधान परिषद के सदस्य (निर्वाचित एवं मनोनीत) शामिल नहीं किए जाते। 

70वें संविधान संशोधन से यह व्यवस्था कर दी गई है कि दो संघ-राज्य क्षेत्र (पांडिचेरी तथा दिल्ली) की विधानसभाओं के सदस्य राष्ट्रपति के निर्वाचन मंडल में शामिल किए जाएंगे।


राष्ट्रपति का निर्वचन कैसे होता है, इसके विषय में संविधान के अनुछेद-55 में उपबंध दिया गया है। 



अनुच्छेद 55:- राष्ट्रपति का निर्वाचन की रीति या पद्धति। 

राष्ट्रपति के निर्वाचन में 2 सिद्धांतों को अपनाया जाता है :-


1) समरूपता तथा समतुल्य ता का सिद्धांत:- 

इस सिद्धांत के अनुसार राज्यों के प्रतिनिधित्व के मापमान में एकरूपता तथा सभी राज्यों और संघ के प्रतिनिधित्व में समतुल्यता होगी। 

इस सिद्धांत का तात्पर्य है कि सभी राज्यों की विधानसभाओं का प्रतिनिधित्व का मान निकालने के लिए एक ही प्रक्रिया अपनाई जाएगी। 

तथा सभी राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों के मत मूल्य का योग संसद के सभी सदस्यों के मत मूल्य के युग के समान होगा। 

राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों के मत मूल्य तथा संसद के सदस्यों के मत मूल्य -- को निर्धारित करने के लिए निम्नलिखित प्रक्रिया अपनाई जाती है। 

विधानसभा के सदस्य के मत मूल्य का निर्धारण :- 

प्रत्येक राज्य की विधानसभा की सदस्य के मतों की संख्या निकालने के लिए उस राज्य की कुल जनसंख्या (जो पिछले जनगणना के अनुसार निर्धारित है) को राज्य विधानसभा की कुल निर्वाचित सदस्य संख्या से विभाजित करके भागफल की 1000 से विभाजित किया जाता है इस प्रकार भाजनफल को एक सदस्य का मत मूल्य मान लेते हैं। 

यदि उक्त विभाजन के परिणाम स्वरुप शेष संख्या 500 से अधिक आए तो प्रत्येक सदस्य के मतों की संख्या में एक और जोड़ दिया जाता है। 

राज्य विधानसभा में सदस्यों का मत मूल्य में प्रकार निकाला जाता है:-

Vidhansabha-Sadasyo-ka-Mat-Mulya
Vidhansabha-Sadasyo-ka-Mat-Mulya




संसद सदस्य के मत मूल्य का निर्धारण:- 

संसद सदस्य का मत मूल्य निर्धारण करने के लिए राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों के मत मूल्य को जोड़कर संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों के योग का भाग दिया जाता है। 

संसद सदस्य का मत मूल्य निम्न प्रकार से निकाला जाता है:-

sansad-sadasyo-ka-mat-mulya
sansad-sadasyo-ka-mat-mulya

इस प्रकार राष्ट्रपति के चुनाव में या ध्यान रखा जाता है कि सभी राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों के मतों के मूल्य का योग संसद के निर्वाचित सदस्यों के मतों के मूल्य का योग बराबर रहे और सभी राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों के मत मूल्य का निर्धारण करने के लिए एक सामान्य प्रक्रिया अपनाई जाए इसे अनुपातिक प्रतिनिधित्व का सिद्धांत भी कहते हैं


2) एकल संक्रमणीय सिद्धांत:- 

इस सिद्धांत का तात्पर्य है कि यदि निर्वाचन में से एक से अधिक उम्मीदवार हो तो मतदाताओं द्वारा मतदान वरीयता क्रम से दिया जाए। 

इसका आशय है यह है कि मतदाता मतदान पत्र में उम्मीदवारों के नाम या चुनाव चिह्न में समक्ष अपना वरीयता क्रम लिखेगा। 



महाभियोग Article-61

  

* राष्ट्रपति पर महाभियोग *


जब राष्ट्रपति द्वारा संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन किया जाता है है तब राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए जो प्रकिया चलाई जाती है उसे महाभियोग कहा जाता है। 

अनुच्छेद 61 में महाभियोग के विषय में उपबंध किया गया है। 

आइये महाभियोग के विषय में निचे विस्तार से  हैं :-

rastrapati-par-mahabhiyog,article-61




अनुच्छेद 61:- राष्ट्रपति पर महाभियोग। 

  • राष्ट्रपति को उसके पद से हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया चलाई जाती है। 
  • राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग की प्रक्रिया तर संचालित की जा सकती है जब उसने संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन किया हो। 
  • राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग चलाने का संकल्प संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है।  
  • लेकिन जिस सदन में महाभियोग का संकल्प पेश किया जाना हो उसके एक चौथाई (1/4) सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित आरोप पत्र राष्ट्रपति को 14 दिन के पूर्व दिया जाना चाहिए। 
  • राष्ट्रपति को आरोप पत्र दिए जाने के 14 दिन के बाद ही सदन में महाभियोग का संकल्प पेश किया जाए आ सकता है। 
  • जिस सदन में संकल्प पेश किया जाए उसके सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई (2/3) बहुमत द्वारा संकल्प पारित किया जाना चाहिए। 
  • जिस सदन में संकल्प पेश किया गया है उसके द्वारा पारित किए जाने के बाद संकल्प दूसरे सदन में भेजा जाएगा। 
  • दूसरा सदन राष्ट्रपति पर लगाए आरोपों की जांच करेगा। 
  • जब दूसरा सदन राष्ट्रपति पर लगाए गए आरोपों की जांच कर रहा हूं तब राष्ट्रपति या तो स्वयं या तो अपने वकील के माध्यम से लगाए गए आरोपों के संबंध में अपना पक्ष प्रस्तुत करेगा और स्पष्टीकरण देगा। 
  • यदि दूसरा सदन राष्ट्रपति पर लगाए आरोपों को सही पाता है और अपनी संख्या के बहुमत से तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई (2/3) बहुमत से पहले सदन द्वारा पारित संकल्प का अनुमोदन कर देता है तो महाभियोग की कार्यवाही पूर्ण हो जाती है। 
  • इस प्रकार राष्ट्रपति अपना पद त्यागने के लिए बाध्य हो जाता है। 

प्राक्कलन और लोकलेखा समिति 

संसद की अस्थाई-तदर्थ समिति 


राष्ट्रपति

 

* भारत का राष्ट्रपति *

bharat-ke-rastrapati
"Ram Nath Kovind"


  • भारतीय संविधान पर ब्रिटेन के संविधान का व्यापक प्रभाव है। 
  • ब्रिटैन के सविधान का अनुकरण करते हुए भारत में सविधान द्वारा "संसदीय-शासन" की स्थापना की गई है। 
  • जिस तरह ब्रिटेन में शासन की प्रमुख वह की रानी होती है, उसी प्रकार भारत में राष्ट्र का प्रमुख "राष्ट्रपति" होते हैं। 
  • भारत और ब्रिटेन के राष्ट्र प्रमुखों में अंतर केवल इतना है कि :
  • ब्रिटेन के राष्ट्र प्रमुख (रानी) का पद वंशानुगत है, जबकि 
  • भारत में राष्ट्र प्रमुख का निर्वाचन होता है। 


चूँकि भारत में राष्ट्रपति निर्वाचन द्वारा चुने जाते है, इसी विशेषता के कारण भारत एक गणतंत्र राष्ट्र है। 

भारत एक गणतंत्र राष्ट्र क्यों है    ------ क्योंकि भारत में राष्ट्रपति निर्वाचन द्वारा चुने जाते है। 

Rastrapati-Bhavan
Rastrapati-Bhavan

राष्ट्रपति:-

  • राष्ट्रपति भारत का संवैधानिक प्रमुख होता है, जो एक निर्वाचक-मंडल द्वारा निर्वाचित किया जाता है। 
  • भारत में सभी कार्य राष्ट्रपति के नाम से ही किये जाते है। 
  • राष्ट्रपति के विषय में संविधान के अनुच्छेद 52-62 और अनुच्छेद 71-73 में उपबंध किया गया है। 


नीचे हम उन्ही अनुच्छेदों को विस्तार में पढ़ेंगे :-

अनुच्छेद 52:- भारत का राष्ट्रपति। 

अनुच्छेद 53:- संघ की कार्यपालिका की शक्ति।

अनुच्छेद 54:- राष्ट्रपति का निर्वाचन।

अनुच्छेद 55:- राष्ट्रपति का निर्वाचन की रीति या पद्धति।

अनुच्छेद 56:- राष्ट्रपति के पदावधी।

अनुच्छेद 57:- पुर्ननिर्वाचन के लिए योग्यता।

अनुच्छेद 58:- राष्ट्रपति निर्वाचित होने के लिए अर्हताएं।

अनुच्छेद 59:- राष्ट्रपति के पद के लिए शर्तें।

अनुच्छेद 60:- राष्ट्रपति द्वारा शपथ।

अनुच्छेद 61:- राष्ट्रपति पर महाभियोग।

अनुच्छेद 62:- राष्ट्रपति के पद में रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन करने का समय। 

अनुच्छेद 71:- राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित या संसक्त विषय।

अनुच्छेद 72:- क्षमा आदि की कुछ मामलों में दण्डादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की राष्ट्रपति की शक्तियां।

अनुच्छेद 73:- संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार।

अनुच्छेद 123:- अध्यादेश जारी करने की शक्ति।

अनुच्छेद 124:- न्यायाधीशों को नियुक्त करने की शक्ति।

अनुच्छेद 143:- उच्चतम न्यायालय से परामर्श की राष्ट्रपति की शक्ति। 





अनुच्छेद 52:- भारत का राष्ट्रपति। 


अनुच्छेद 53:- संघ की कार्यपालिका की शक्ति। 

  • संघ की कार्यपालिका की शक्तियां राष्ट्रपति में निहित है और वह अपनी इस शक्ति का प्रयोग अपने अधीनस्थ प्राधिकारियों (अर्थात -केंद्रीय मंत्रिमंडल) के द्वारा करता है।



अनुच्छेद 54:- राष्ट्रपति का निर्वाचन। 

  • राष्ट्रपति का निर्वाचन ऐसे निर्वाचन मंडल द्वारा किया जाएगा जिसमें संसद (लोकसभा तथा राज्यसभा) तथा राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य शामिल होंगे। 
  • राष्ट्रपति के निर्वाचन मंडल में संसद के मनोनीत सदस्य। राज्य विधानसभाओं के मनोनीत सदस्य तथा राज्य विधान परिषद के सदस्य (निर्वाचित एवं मनोनीत) शामिल नहीं किए जाते। 
  • 70वें संविधान संशोधन से यह व्यवस्था कर दी गई है कि दो संघ-राज्य क्षेत्र (पांडिचेरी तथा दिल्ली) की विधानसभाओं के सदस्य राष्ट्रपति के निर्वाचन मंडल में शामिल किए जाएंगे। 



अनुच्छेद 55:- राष्ट्रपति का निर्वाचन की रीति या पद्धति। 

राष्ट्रपति के निर्वाचन में 2 सिद्धांतों को अपनाया जाता है :-

1) समरूपता तथा समतुल्य ता का सिद्धांत:- 

  • इस सिद्धांत के अनुसार राज्यों के प्रतिनिधित्व के मापमान में एकरूपता तथा सभी राज्यों और संघ के प्रतिनिधित्व में समतुल्यता होगी। 
  • इस सिद्धांत का तात्पर्य है कि सभी राज्यों की विधानसभाओं का प्रतिनिधित्व का मान निकालने के लिए एक ही प्रक्रिया अपनाई जाएगी। 
  • तथा सभी राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों के मत मूल्य का योग संसद के सभी सदस्यों के मत मूल्य के युग के समान होगा। 


राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों के मत मूल्य
 तथा संसद के सदस्यों के मत मूल्य -- को निर्धारित करने के लिए निम्नलिखित प्रक्रिया अपनाई जाती है। 

** विधानसभा के सदस्य के मत मूल्य का निर्धारण :- 

  • प्रत्येक राज्य की विधानसभा की सदस्य के मतों की संख्या निकालने के लिए उस राज्य की कुल जनसंख्या (जो पिछले जनगणना के अनुसार निर्धारित है) को राज्य विधानसभा की कुल निर्वाचित सदस्य संख्या से विभाजित करके भागफल की 1000 से विभाजित किया जाता है इस प्रकार भाजनफल को एक सदस्य का मत मूल्य मान लेते हैं। 

यदि उक्त विभाजन के परिणाम स्वरुप शेष संख्या 500 से अधिक आए तो प्रत्येक सदस्य के मतों की संख्या में एक और जोड़ दिया जाता है। 

राज्य विधानसभा में सदस्यों का मत मूल्य में प्रकार निकाला जाता है:-

Vidhansabha-Sadasyo-ka-Mat-Mulya
Vidhansabha-Sadasyo-ka-Mat-Mulya



संसद सदस्य के मत मूल्य का निर्धारण:- 

  • संसद सदस्य का मत मूल्य निर्धारण करने के लिए राज्यों की विधानसभाओं के सदस्यों के मत मूल्य को जोड़कर संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों के योग का भाग दिया जाता है। 

संसद सदस्य का मत मूल्य निम्न प्रकार से निकाला जाता है:-

sansad-sadasyo-ka-mat-mulya
sansad-sadasyo-ka-mat-mulya


इस प्रकार राष्ट्रपति के चुनाव में या ध्यान रखा जाता है कि सभी राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों के मतों के मूल्य का योग संसद के निर्वाचित सदस्यों के मतों के मूल्य का योग बराबर रहे और सभी राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों के मत मूल्य का निर्धारण करने के लिए एक सामान्य प्रक्रिया अपनाई जाए इसे अनुपातिक प्रतिनिधित्व का सिद्धांत भी कहते हैं


2) एकल संक्रमणीय सिद्धांत:- 

  • इस सिद्धांत का तात्पर्य है कि यदि निर्वाचन में से एक से अधिक उम्मीदवार हो तो मतदाताओं द्वारा मतदान वरीयता क्रम से दिया जाए। 
  • इसका आशय है यह है कि मतदाता मतदान पत्र में उम्मीदवारों के नाम या चुनाव चिह्न में समक्ष अपना वरीयता क्रम लिखेगा। 


प्रश्नकाल और शून्यकाल क्या है ?


अनुच्छेद 56:- राष्ट्रपति के पदावधी। 

  • राष्ट्रपति अपने पद ग्रहण की तिथि से 5 वर्ष की अवधि तक अपने पद पर बना रहता है। 
  • लेकिन इस 5 वर्ष की अवधि के पूर्व भी वह उपराष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र दे सकता है या 
  • उसे 5 वर्ष की अवधि के पूर्व संविधान के उल्लंघन के लिए संसद द्वारा बनाए गए महाभियोग द्वारा हटाया जा सकता है। 
  • राष्ट्रपति द्वारा उप राष्ट्रपति को संबोधित त्यागपत्र के सूचना उप राष्ट्रपति के द्वारा लोकसभा के अध्यक्ष को अविलंब दी जाती है। 
  • राष्ट्रपति अपने 5 वर्ष के कार्यकाल के पूरा करने के बाद भी अब तक राष्ट्रपति के पद पर बना रहता है जब तक उसका उत्तराधिकारी पद ग्रहण नहीं कर लेता है। 




अनुच्छेद 57:- पुर्ननिर्वाचन के लिए योग्यता। 

  • भारत के राष्ट्रपति पद पर पदस्थ व्यक्ति दूसरे कार्यकाल के लिए भी चुनाव में उम्मीदवार बन सकता है।  
  • पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद दो बार राष्ट्रपति के पद पर रहे थे। 



अनुच्छेद 58:- राष्ट्रपति निर्वाचित होने के लिए अर्हताएं। 

  • इस अनुच्छेद अनुसार कोई व्यक्ति राष्ट्रपति होने के योग्य तब होगा जब वह:- 
  • भारत का नागरिक हो,
  • 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो, 
  • लोकसभा का सदस्य निर्वाचित किए जाने की योग्य हो, तथा 
  • भारत सरकार के या किसी राज्य सरकार के अधीन अथवा इन दोनों सरकारों में से किसी के नियंत्रण में किसी स्थानीय या अन्य पदाधिकारी के अधीन लाभ का पद धारण ना करता हो। 


यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति के पद पर या संघ अथवा किसी राज्य के मंत्री परिषद का सदस्य है, तो यह नहीं माना जाएगा कि वह लाभ के पद पर है। 




अनुच्छेद 59:- राष्ट्रपति के पद के लिए शर्तें। 

  • राष्ट्रपति की परिलब्धियां और उनके भत्ते उनके कार्यकाल में घटाएं नहीं जा सकते। 
  • राष्ट्रपति के वेतन एवं भत्ते को आयकर से छूट प्राप्त है। 
  • राष्ट्रपति को निशुल्क शासकीय निवास उपलब्ध होता है। 
  • वह ऐसी परिलब्धियों, भत्तों और विशेषाधिकारों का हकदार होता है जो संसद विधि द्वारा अवधारित करें। 
  • राष्ट्रपति का वेतन ₹5लाख महीना होता है। 
  • राष्ट्रपति को पदावधि समाप्ति या पद त्याग देने के पश्चात उनके वेतन का 50% का पेंशन दिए जाने का प्रावधान किया गया है। 





अनुच्छेद 60:- राष्ट्रपति द्वारा शपथ। 

  • राष्ट्रपति को शपथ दिलाता है ----- भारत के मुख्य न्यायाधीश या उसकी अनुपस्थिति में उच्चतम न्यायालय में उपलब्ध वरिष्ठतम न्यायाधीश  
  • राष्ट्रपति के शपथ का प्रारूप अनुसूची-2 में दिया गया है। 
  • राष्ट्रपति संविधान और विधि के परिरक्षण संरक्षण और प्रतिरक्षण का शपथ लेता है


राज्यसभा क्या होता है ?

राज्यसभा के पदाधिकारी 

अनुच्छेद 61:- राष्ट्रपति पर महाभियोग। 

  • राष्ट्रपति को उसके पद से हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया चलाई जाती है। 
  • राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग की प्रक्रिया तर संचालित की जा सकती है जब उसने संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन किया हो। 
  • राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग चलाने का संकल्प संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है।  
  • लेकिन जिस सदन में महाभियोग का संकल्प पेश किया जाना हो उसके एक चौथाई (1/4) सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित आरोप पत्र राष्ट्रपति को 14 दिन के पूर्व दिया जाना चाहिए। 
  • राष्ट्रपति को आरोप पत्र दिए जाने के 14 दिन के बाद ही सदन में महाभियोग का संकल्प पेश किया जाए आ सकता है। 
  • जिस सदन में संकल्प पेश किया जाए उसके सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई (2/3) बहुमत द्वारा संकल्प पारित किया जाना चाहिए। 
  • जिस सदन में संकल्प पेश किया गया है उसके द्वारा पारित किए जाने के बाद संकल्प दूसरे सदन में भेजा जाएगा। 
  • दूसरा सदन राष्ट्रपति पर लगाए आरोपों की जांच करेगा। 
  • जब दूसरा सदन राष्ट्रपति पर लगाए गए आरोपों की जांच कर रहा हूं तब राष्ट्रपति या तो स्वयं या तो अपने वकील के माध्यम से लगाए गए आरोपों के संबंध में अपना पक्ष प्रस्तुत करेगा और स्पष्टीकरण देगा। 
  • यदि दूसरा सदन राष्ट्रपति पर लगाए आरोपों को सही पाता है और अपनी संख्या के बहुमत से तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई (2/3) बहुमत से पहले सदन द्वारा पारित संकल्प का अनुमोदन कर देता है तो महाभियोग की कार्यवाही पूर्ण हो जाती है। 
  • इस प्रकार राष्ट्रपति अपना पद त्यागने के लिए बाध्य हो जाता है। 




अनुच्छेद 62:- राष्ट्रपति के पद में रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन करने का समय और आकस्मिक रखती को भरने के लिए निर्वाचित व्यक्ति की पदावधि। 

  • इस उपबंध में केवल यह अपेक्षा की गई है कि राष्ट्रपति का चुनाव निर्धारित समय के अंदर संपन्न करा लिया जाना चाहिए निर्वाचन की प्रक्रिया को 5 वर्ष की अवधि समाप्त हो जाने के बाद तक स्थगित नहीं रखा जा सकता। 



अनुच्छेद 71:- राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित या संसक्त विषय। 

  • राष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित विवाद का विनिश्चय उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाएगा। 
  • यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रपति के रूप में निर्वाचित होकर पद ग्रहण कर लेता है और बाद में उसका चुनाव उच्चतम न्यायालय द्वारा अवैध घोषित किया जाता है तो राष्ट्रपति के पद पर रहते हुए उसके द्वारा किया गया कार्य की गई घोषणा अविधिमान्य नहीं होगा। 


प्राक्कलन और लोकलेखा समिति 

संसद की अस्थाई और तदर्थ समिति 


अनुच्छेद 72:- क्षमा आदि की कुछ मामलों में दण्डादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की राष्ट्रपति की शक्तियां। 

  • राष्ट्रपति को क्षमा तथा कुछ मामलों में दण्डादेश के निलंबन परिहार यह लघु करण की शक्ति प्रदान की गई है। 
  • राष्ट्रपति को निम्नलिखित मामले में क्षमा तथा दोष सिद्धि के निलंबन परिहार या लघु करण की शक्ति प्राप्त है 
  • सेना न्यायालयों द्वारा दिए गए दण्ड के मामले में 
  • मृत्युदण्ड आदेश के सभी मामलों में 
  • उन सभी मामलों में जिसमें दण्ड या दण्डादेश ऐसे विषय संबंधित किसी विधि के विरुद्ध अपराध के लिए दिया गया है, जिस विषय पर संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है। 


क्षमा का तात्पर्य:- अपराध के दंड से मुक्ति प्रदान करना है। 

प्रतिलंबन का तात्पर्य:- विधि द्वारा विहित दण्ड के स्थाई स्थगन से है। 

परिहार का तात्पर्य:-  दण्ड की प्रकृति में परिवर्तन किए बिना दण्ड की मात्रा को कम किया जाना है। 

लघुकरण का तात्पर्य:- दण्ड की प्रकृति में परिवर्तन करना। 


  • राष्ट्रपति अपनी इस शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह पर करता है। 
  • यदि राष्ट्रपति द्वारा इस शक्ति का प्रयोग किया जाता है तो उसका न्यायिक पुनर्विलोकन न्यायालय न्यायालय द्वारा किया जा सकता है। 



अनुच्छेद 73:- संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार। 




अनुच्छेद 123:- अध्यादेश जारी करने की शक्ति। 

  • राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान की गई है। 
  • राष्ट्रपति द्वारा जारी अध्यादेश का वही प्रभाव होता है जो संसद द्वारा पारित तथा राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित अधिनियम का होता है। 
  • लेकिन अंतर यह है कि अधिनियम का प्रभाव तब तक स्थाई होता है जब तक संसद द्वारा या राष्ट्रपति के अध्यादेश द्वारा निरस्त ना कर दिया जाए। 
  • इसके विपरित अध्यादेश केवल 6 मास तक प्रवर्तन में रहता है। 
  • यदि 6 मास के अंदर संसद द्वारा अनुमोदित किए जाने पर राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त करने के बाद अधिनियम हो जाता है। 
  • राष्ट्रपति के द्वारा अध्यादेश संसद के विश्रांतिकाल में उस समय जारी किया जाता है जब राष्ट्रपति को यह विश्वास हो जाए कि ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो गई है जिसके अनुसार अविलंब कार्यवाही करना आवश्यक है। 




अनुच्छेद 124:-  न्यायाधीशों को नियुक्त करने की शक्ति। 

  • राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को नियुक्त करने की शक्ति है।  



अनुच्छेद 143:- उच्चतम न्यायालय से परामर्श की राष्ट्रपति की शक्ति। 

  • जब राष्ट्रपति को ऐसा प्रतीत हो की विधि या तथ्य का ऐसा कोई प्रश्न उत्पन्न हुआ है या उत्पन्न होने की संभावना है जो व्यापक महत्व का है उस पर उच्चतम न्यायालय की राय प्राप्त करना आवश्यक हैं, तब वह उस प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय की राय मांग सकता है। 



Thursday, 16 September 2021

भारतीय संविधान की10 प्रमुख विशेषताएं

 

* संविधान की विशेषताएं *


samvidhan-ki-10-pramukh-vishashatayen
 


भारतीय संविधान की अनेक विशेषताएं हैं, जो इस प्रकार है :-

  • लिखित एवं सर्वाधिक व्यापक संविधान  
  • प्रभुत्व संपन्न, लोकतंत्रात्मक, पंथनिरपेक्ष तथा समाजवादी संविधान 
  • स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना 
  • संसदीय पद्धति की सरकार की स्थापना 
  • विधि के शासन की स्थापना 
  • नम्य तथा अनम्य संविधान 
  • केंद्राभिमुख संविधान 
  • वयस्क मताधिकार की व्यवस्था 
  • एकल नागरिकता का प्रावधान 
  • अनेक देशों के संविधान के तत्वों का समावेश



1) लिखित एवं सर्वाधिक व्यापक संविधान:- 

भारत के संविधान का निर्माण विशेष समय पर विशेष संविधान सभा द्वारा किया गया और इसे पूर्ण रूप से लिखा गया है। 

इस संविधान में लिखित रूप में प्रशासन तथा संवैधानिक अधिकारों के कार्यों का वर्णन, न्यायालयों के गठन तथा उनकी अधिकारिता, केंद्र राज्य संबंध, अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के संरक्षण, मूल अधिकार तथा उनके संरक्षण एवं राज्य के नीति निदेशक तत्वों के संबंध में व्यापक रूप से लिखित व्यवस्था की गई है। 

जिस समय भारत का संविधान लागू किया गया उस समय इसमें 395 अनुच्छेद एवं 8 अनुसूचियां थी वर्त्तमान में संविधान में अनुच्छेदों की संख्या गणना की दृष्टि से 444 तथा अनुसूचियों की संख्या 12 हो गई है। 


2) प्रभुत्व संपन्न, लोकतंत्रात्मक, पंथनिरपेक्ष तथा समाजवादी संविधान:- 

इसके माध्यम से भारत को संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, लोकतंत्रात्मक, पंथनिरपेक्ष और समाजवादी राज्य की स्थापना की गई है। 

प्रभुत्व संपन्न राज्य का तात्पर्य ऐसे राज्य से है जो बाहरी नियंत्रण से मुक्त हो और जिस पर किसी अन्य देश की प्रभुता ना हो। जो आपने आंतरिक एवं विदेशी नीतियों का निर्धारण करने में स्वयं सक्षम हो तथा किसी अंतरराष्ट्रीय संधि या समझौते को मानने के लिए बाध्य न हो। 


लोकतंत्र का अर्थ है ऐसी शासन व्यवस्था जिसके अंतर्गत सरकार की स्थापना जनता द्वारा तथा जनता के लिए की जाती है। भारत का शासन सीधे जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के द्वारा संचालित किया जाता है। 


पंथनिरपेक्ष का अर्थ है ऐसी शासन व्यवस्था जिसमें सरकार का कोई धर्म नहीं होता और वह किसी धर्म को न तो समर्थन प्रदान करता है और न किसी धर्म या धार्मिक क्रियाकलापों का विरोध करता है।  भारत में सभी धर्मों को समान आदर दिया जाता है। 1976 में 42 वें संविधान संशोधन द्वारा पंथनिरपेक्ष शब्द को संविधान की उद्देशिका में शामिल करके धर्मनिरपेक्षता को और अधिक स्पष्ट किया गया है।  


समाजवादी राज्य की स्थापना संविधान का मूल उद्देश्य है और इसकी अभिपुष्टि संविधान की उद्देशिका में समाजवादी शब्द को अंत:स्थापित करके और कई अन्य क्षेत्रों में संशोधन करके तथा कई नियमों को अंत:स्थापित करके की गई है। 


3) स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना:- 

भारतीय संविधान द्वारा स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना की गई है। न्यायाधीशों की नियुक्ति, वेतन-भत्ता तथा पद से हटाए जाने के संबंध में संविधान में स्पष्ट प्रावधान किया गया है। जिस कारण सरकार उन पर दबाव नहीं डाल सकती। 


4) संसदीय पद्धति की सरकार की स्थापना:-

भारत का संविधान भारत में संसदीय पद्धति की सरकार की व्यवस्था करता है। संसदीय व्यवस्था की सरकार की मुख्य विशेषता यह है कि सरकार विधायिका के प्रति उत्तरदाई होती है। इस प्रकार की सरकार की दूसरी विशेषता यह है कि कार्यपालिका का वास्तविक प्रधान जनता का प्रतिनिधि होता है और जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा चुना जाता है। भारत का संविधान संसदीय पद्धति की स्थापना करता है क्योंकि केंद्र की सरकार लोकसभा के प्रति और राज्यों की सरकार विधानसभाओं के प्रति उत्तरदाई होते हैं। प्रधानमंत्री तथा राज्यों में मुख्यमंत्री क्रमशः लोक सभा के सदस्यों तथा विधानसभा के सदस्यों द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं। 



5) विधि के शासन की स्थापना:-

भारतीय संविधान भारत में विधि के शासन की स्थापना करता है। इसके लिए अनुच्छेद 13, 20, 21, 22, 32, 226 तथा 256 में व्यापक प्रावधान किया गया है। भारत में संविधान सर्वोच्च है और इस कारण कोई भी व्यक्ति, अधिकारी संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन नहीं कर सकता। भारत में राज्य के प्रत्येक अंग विधि के शासन से नियमित तथा नियंत्रित होते हैं। 


6) मूल अधिकारों का समावेश:-

भारतीय संविधान में मूल अधिकारों को समाविष्ट किया गया है तथा यह अधिकार नागरिकों तथा गैर-नागरिकों दोनों को प्रदान किया गया है। भारत के संविधान में जोड़े गए मूल अधिकार संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से लिया गया है। ऐसे अधिकारों का तात्पर्य उन अधिकारों से हैं जो मनुष्य के लिए आवश्यक हो तथा मनुष्य को जन्म से ही प्राप्त हो। इन अधिकारों को मानव अधिकार भी कहा जाता है। 



7) राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का समावेश:-

संविधान के भाग -4 में कुछ ऐसे निदेशक तत्वों का उल्लेख किया गया है जो राज्य के प्रशासन के लिए मूलभूत हैं तथा जिनका पालन करना राज्य का पवित्र कर्तव्य है। इन्हीं निर्देशक तत्वों के माध्यम से देश में कल्याणकारी राज्य की स्थापना का प्रावधान किया गया है। उच्चतम न्यायालय ने अपने कई निर्णय में कहा है कि कुछ निदेशक तत्व राज्य के लिए मूलभूत हैं और राज्यों द्वारा उनका पालन किया जाना चाहिए। 



8) नम्य तथा अनम्य संविधान:- 

भारत के संविधान में नम्यता तथा अनम्रता दोनों के लक्षण एक साथ विद्यमान है। 

संविधान नम्य इसलिए हैं क्योंकि इसके अधिकतर प्रावधानों को संसद द्वारा साधारण बहुमत से संशोधित किया जा सकता है। 

जबकि अनम्य इसलिए क्योंकि कुछ प्रावधानों को संशोधित करना अत्यंत कठिन है और उसके लिए विशेष प्रक्रिया अपनायी जाती है। 



9) केंद्राभिमुख संविधान:-

वैसे तो सामान्यतः भारत का संविधान संघात्मक है लेकिन विशेष परिस्थितियों में जैसे आपातकाल की स्थिति में भारत का संविधान एकात्मक हो जाता है और केंद्राभिमुख हो जाता है अर्थात केंद्र की शक्ति सर्वोच्च हो जाती है। 



10) वयस्क मताधिकार की व्यवस्था:-

सरकार का गठन जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है। 

प्रतिनिधियों का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर किया जाता है। 

संविधान के प्रवर्तन के समय मतदान का अधिकार केवल उन्हें था जो 21 वर्ष की आयु पूरी कर लिए हैं लेकिन 61 वें संविधान संशोधन द्वारा मतदान का अधिकार उन व्यक्तियों को भी प्रदान कर दिया गया है जो 18 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुके हैं। 


11) एकल नागरिकता का प्रावधान:-

सामान्यतः संघीय संविधान में दोहरी नागरिकता का प्रावधान होता है एक संघ की दूसरी राज्य की।

लेकिन भारतीय संविधान इसका अपवाद है। भारतीय संविधान संघीय संविधान होते हुए भी एकल नागरिकता का प्रावधान करता है। 



12) मूल कर्तव्यों का विवरण:-

भारतीय संविधान इस अर्थ में विशिष्ट है कि इसमें नागरिकों के मूल कर्तव्य को भी जोड़ा गया है। 

भारत संविधान के प्रवर्तन के समय संविधान में इन कर्तव्यों को शामिल नहीं किया गया था लेकिन 42 वें संविधान संशोधन द्वारा मूल कर्तव्यों को संविधान जोड़ा गया है। 



13) कई विदेशी संविधानो के तत्वों का समावेश:- 

भारतीय संविधान का निर्माण के लिए गठित विशेष संविधान सभा के सदस्यों ने कई देशों के संविधान का अध्ययन किया किया और विभिन्न देशों के संविधानों का अध्ययन कर विशिष्ट गुणों को संविधान में सम्मिलित किया। 

भारतीय संविधान के निर्माण के समय लगभग 60 देशों के संविधान के मुख्य तत्वों को संविधान में शामिल किय गया। 





बजट से संबंधित महत्वपूर्ण शब्दावली

 

बजट से संबंधित महत्वपूर्ण शब्दावली 


क्या होता है बजट ? 

एक वित्त वर्ष में सरकार कितना राजस्व प्राप्त करेगी और उसका सार्वजनिक वह कितना होगा इस बात की पूरी जानकारी मुहैया कराने को बजट कहा जाता है। बजट की घोषणा के दौरान ही सरकार तमाम योजनाओं की घोषणा भी करती है, क्योंकि योजनाओं को चलाने में भी सरकार का पैसा खर्च होता है। वही करारोपण समेत तमाम तरह की राहतों की घोषणा भी बजट में की जाती है। 



कितने तरह के होते हैं बजट :-

बजट मुख्य रूप से 3-प्रकार के होते हैं :-

  • बैलेंस बजट = सार्वजनिक आय और सार्वजनिक व्यय बराबर होता हैं। 
  • अधिशेष बजट = सार्वजनिक आय, सार्वजनिक व्यय से अधिक होती है। 
  • घाटे का बजट = सार्वजनिक व्यय, सार्वजनिक आय से अधिक होती है। 




वित्त विधेयक (Finance Bill) :-

संघीय बजट को पेश करने के तुरंत बाद जो बिल पास किया जाता है उसे वित्त विधेयक कहते हैं। वित्त विधेयक में सार्वजनिक आय के सभी स्त्रोतों को दर्शाया जाता है। 



विनियोग विधेयक (Appropriation Bill):-

वित्त विधेयक के साथ-साथ सरकार बजट के दूसरे भाग को भी सदन के सामने रखती है, जिसे (Appropriation Bill) यानी विनियोग विधेयक कहते हैं। इसमें सार्वजनिक व्यय की विभिन्न मदों की जानकारी रहती है। 



महंगाई दर (Inflation Rate):-

इसे प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है। महंगाई दर बढ़ने का आसान मतलब है की करेंसी का मूल्य कर रहा है और वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतों में वृद्धि हो रही है। 



राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit):-

सरकार की राजस्व प्राप्तियों से ऊपर किया गया सार्वजनिक व्यय राजकोषीय घाटा कहलाता है। 

राजकोषीय घाटा = राजस्व प्राप्तियां + पूंजी निवेश प्राप्तियां - सार्वजनिक व्यय 



राजकोषीय नीति (Fiscal Policy):-

अर्थव्यवस्था की गतिविधियों को संचालित करने के लिए जो सरकार द्वारा उठाए गए उपायों को राजकोषीय नीति में समाहित किया जाता है। करारोपण, सार्वजनिक व्यय, सार्वजनिक ऋण, घाटा वित्तीयन एवं राजकोषीय प्रबंधन राजकोषीय नीति के संगटक हैं। 



राजकोषीय अधिशेष (Fiscal Surplus):-

सार्वजनिक व्यय, सरकार की राजस्व प्राप्ति एवं पूंजी विनिवेश से कम रहने पर राजकोषीय अधिशेष की स्थिति होती है। हालांकि ऐसा कम ही होता है 



राजस्व घाटा (Revenue Deficit):-

राजस्व खाते की प्राप्ति एवं राजस्व खाते के व्यय के अंतर को राजस्व घाटा कहते हैं। 



प्राथमिक घाटा(Primary Deficit):- 

राजकोषीय घाटा में से पूर्व में लिए गए सार्वजनिक ऋण पर ब्याज भुगतान को घटाने पर प्राथमिक घाटा आता है। राजकोषीय घाटे में सरकार की तरफ से लिया जाने वाला कर्ज और पुराने कर्ज पर चुकाए जाने वाला ब्याज शामिल होता है। प्राथमिक घाटा में पुराने कर्ज चुकाने वाले ब्याज को नहीं जोड़ा जाता। 


विनिवेश (Disinvestment):-

जब सरकार अपनी संपत्तियों को बेचकर संसाधन जुटाती है तो उसे विनिवेश कहते हैं। सरकार सार्वजनिक क्षेत्रों की कंपनियों में हिस्सेदारी उसका आईपीओ लाकर भी बेचती है 



चालू खाते का घाटा (Current Account Deficit):- 

किसी देश के भुगतान संतुलन के चालू खाते में घाटे की स्थिति उस अवस्था में उत्पन्न होती है जब विदेशों में अर्जित विदेशी विनिमय (निर्यात प्राप्ति एवं अदृश्य प्राप्तियां) विदेशों को किए गए भुगतानों (आयात देयताएँ एवं अदृश्य मदों के भुगतान) से कम होते हैं। अन्य शब्दों में जब निर्यात आयत से कम हो  उसे चालू खाते का घाटा कहते हैं।  



व्यापार घाटा (Trade Deficit):-

व्यापार घाटा चालू खाते के घाटे का बहुत बड़ा हिस्सा होता है। निर्यात से अर्जित विदेशी विनिमय तथा आयात के लिए किए गए भुगतान का अंतर व्यापार घाटा है। 



जीडीपी (GDP):-

किसी देश में किसी निश्चित समय अवधि में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के मौद्रिक योग को सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं। वैकल्पिक रूप से उत्पाद शुल्क, वस्तु एवं सेवा कर, आयात शुल्क, निर्यात शुल्क आदि खर्च के लिहाज से उपभोक्ता द्वारा और सरकार द्वारा जितनी रकम खर्च की जाती है उसे जोड़ने पर जो जीडीपी निकलता है। 



प्रत्यक्ष कर (Direct Tax):- 

किसी व्यक्ति या संस्थान की आय पर जो टैक्स लगते हैं, वह प्रत्यक्ष कर इस श्रेणी में आते हैं। इसमें आयकर, कॉरपोरेट कर, निगम कर और उत्तराधिकार कर, उपहार कर आदि शामिल हैं। 



अप्रत्यक्ष कर (Indirect Tax):-

वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन बिक्री या उपभोग पर लगाए जाने वाले ऐसे कर अप्रत्यक्ष कर कहलाते हैं, जिन्हें कोई करदाता किसी अन्य पर परिवर्तित कर सकता है। 


मौद्रिक नीति (Monetary Policy):-

मौद्रिक नीति ऐसी प्रक्रिया है जिसकी मदद से रिजर्व बैंक अर्थव्यवस्था में मुद्रा की आपूर्ति को नियंत्रण करता है। इसमें महंगाई पर अंकुश लगाया जाता है,  कीमतों में स्थिरता लाई जाती है और टिकाऊ आर्थिक विकास दर का लक्ष्य हासिल करने की कोशिश की जाती है। 

रोजगार के अवसर तैयार करना भी इसके उद्देश्य में से एक हैं। 

    1. रेपो दर 
    2. रिवर्स रेपो दर 
    3. सीमांत स्थायी सुविधा दर 
    4. बैंक दर 
    5. नकदी प्रारक्षित अनुपात 
    6. सांविधिक तरलता अनुपात, तथा 
    7. खुले बाजार की क्रियाएं मौद्रिक नीति के उपकरण हैं। 



राष्ट्रीय कर्ज (Nationa Debt):-

केंद्र सरकार के राजकोष में शामिल कुल कर्ज को राष्ट्रीय कर्ज कहते हैं।बजट घाटे को पूरा करने के लिए सरकार इस तरह के कर लेती है। 



बजट के बाहर से कर (Off Budget Borrowing):-

यह वह कर्ज होते हैं जो सरकार खुद नहीं लेती लेकिन इसे सरकार के निर्देश पर किसी सरकारी काम या प्रोजेक्ट के लिए ही लिया जाता है। 

उदाहरण के लिए सरकार का एक बड़ा खर्च होता है "खाद्य सब्सिडी" देना। वर्ष 2020-21 में सरकार ने कुल 1,51,000 करोड़ रूपये में से केवल 77,892 करोड़ का ही दिया। बाकी का बिल स्मॉल सेविंग फंड के जरिए चुकाया गया। यहां नेशनल सेविंग फंड के जरिए उधार लेना (Off Budget Borrowing) है। 





केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त मूल-अधिकार

   मूल अधिकार की परिभाषा :- मूल अधिकारों को उन अधिकारों के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास लिए आवश्यक हो...